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Archive for the ‘माझ्या कविता’ Category

साथ लाया था वो सेहरा और खिंचा दायरा
अब तो जीवन भर है पहरा और खिंचा दायरा

ख्वाब आंखो में हजारो, जिंदगी की आस है
ख्वाब टूटे, सब है बिखरा और खिंचा दायरा

दौडना तो दूर है, चलना भी मुश्किल है यहां
बेडियोंके के साथ कोहरा और खिंचा दायरा

बंद कमरा और आंसू, इतनी सीमित जिंदगी
अब तो है गुमनाम चेहरा और खिंचा दायरा

इस फलक पर नाम अपना देखने की चाह है
दिल है घायल, वक्त ठहरा और खिंचा दायरा

कितने दिन ऐसे जियेंगे, बस अभी सारे जुलम
है अटल संघर्ष गहरा और खिंचा दायरा

एक दिन आएगा ऐसा, कुछ करेंगे खुद ही हम
तोड देंगे हर वो पहरा और खिंचा दायरा

जयश्री अंबासकर

ही कविता तुम्हाला माझ्या आवाजात खाली दिलेल्या लिंकवर ऐकता येईल

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वृत्त – आनंद
गा गालगाल गागा

देतोस का उजाळा
त्या धुंद आठवांना
होतोस काय हळवा
स्पर्शून आठवांना

त्या एकल्या दुपारी
तो प्रश्न कापरासा
होकार लाजरासा
इन्कारही जरासा

झाल्या कितीक नंतर
सांजा अजून कातर
जगणे कठीण होते
विरहातले निरंतर

आहे तसा शहाणा
अपुला जरी दुरावा
आतून पेट घेतो
पण हाच रे दुरावा

तो चंद्र अजुन अर्धा
दोघात वाटलेला
अन् पौर्णिमेत अजुनी
तू मुक्त सांडलेला

जयश्री अंबासकर

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मौजूद था पर आसमां में, चांद कुछ नाराज था
बेशक मेरे मेहबूब के ही, नूर का आगाज था      

क्या करू तारीफ उनकी, हर अदा थी शायरी
शायरीमें कातिलाना, क्या गजब अंदाज था

जन्नत से उतरी हूर सी थी, क्या  करू लफ़्जोबयां 
नर्गिसी मासूम चेहरा, हुस्न का सरताज था  

उनकी वो संजीदगी में, नर्म सा संगीत था
खिलखिलाना भी तो उनका, जैसे कोई साज था

शाम की तनहाइयों में दर्द का एहसास था
दर्द ना उनका कभी हमदर्द का मोहताज था

देखी है आंखों में उनकी, दर्द की परछाइयाँ  
जख्म क्या था, दर्द क्या था, ये छुपा इक राज था

चंद यादे छोडकर, चुपचाप वो रुखसत हुए
राज सीने में दफन और बस खुदा हमराज था

जयश्री अंबासकर

ये शायरी आप मेरी आवाज में नीचे दी हुई लिंकपर सुन सकते है

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तनहा ये राहे, मंजिल न कोई
लंबा सफर है  साहिल न कोई ॥

यादों में धुंदले, कुछ पल है तेरे
कुछ बिखरे बिखरे, कुछ है सवारे
न आहट है तेरी, न दस्तक है कोई
लंबा सफर है  साहिल न कोई ॥

ख्वाबों में हलचल, कभी थी बहारे
कटी उम्र सारी उसी के सहारे
लेकर उमंगे, आया न कोई
लंबा सफर है  साहिल न कोई ॥

परवाह ना थी, किसीको हमारी
आंखों में थी सिर्फ अश्कोंकी बारी
उम्मीद अब ना, हसरत न कोई
लंबा सफर है  साहिल न कोई ॥

गुमनाम गलियां, गुमनाम मेले
चलते रहे हम, अकेले अकेले
अब तो है आदत शिकायत न कोई
लंबा सफर है  साहिल न कोई ॥

जयश्री अंबासकर

You can listen this Poem in My Voice on the link below

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वृत्त – शुध्दसती
८ २ २ (प – +)

हसतात जर्द पिवळे
घड सोनझुंबरांचे
ग्रीष्मात अनुभवावे
सौंदर्य बहाव्याचे

धग सोसुनी बहावा
सुखहिंदोळे घेतो
वैभव कांचनवर्खी
जगताला दाखवतो

वणव्यातला निखारा
कवटाळुनी उराशी
मिरवतो डौल अपुला
गुलमोहर बघ हौशी

काहिली सोसताना
हसणे जरा पहा तू
शिक पोळुनी बहरणे
गुलमोहराकडे तू

बघ समरसून मनुजा
ऋतुसोहळे धरेचे
सांभाळ तूच आता
औदार्य निसर्गाचे

जयश्री अंबासकर

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