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Archive for the ‘शायरी’ Category

चुस्त लम्हें जिंदगीके खो गये जाने किधर
सुस्त सी खामोशियों में सिर्फ यादोंके भंवर

चंद बादल आसमां मे फिर भी था ऐसा असर
रोशनी सूरज की मेरे खो गयी जाने किधर

दूर तक कोई किनारा, अब भी ना आता नजर
डूबती कश्ती में कैसे, खत्म होगा ये सफर

सुबह की ना ताजगी है, रात को ना हमसफर
अब तो हिस्से में पडी है सिर्फ सूनी दोपहर

शोरगुल भी था कभी पर, अब तो जीवन  खंडहर
बस है सन्नाटों में लिपटे, सर्द से शामो सहर

जयश्री अंबासकर

You can listen this गझल on the link below

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मौजूद था पर आसमां में, चांद कुछ नाराज था
बेशक मेरे मेहबूब के ही, नूर का आगाज था      

क्या करू तारीफ उनकी, हर अदा थी शायरी
शायरीमें कातिलाना, क्या गजब अंदाज था

जन्नत से उतरी हूर सी थी, क्या  करू लफ़्जोबयां 
नर्गिसी मासूम चेहरा, हुस्न का सरताज था  

उनकी वो संजीदगी में, नर्म सा संगीत था
खिलखिलाना भी तो उनका, जैसे कोई साज था

शाम की तनहाइयों में दर्द का एहसास था
दर्द ना उनका कभी हमदर्द का मोहताज था

देखी है आंखों में उनकी, दर्द की परछाइयाँ  
जख्म क्या था, दर्द क्या था, ये छुपा इक राज था

चंद यादे छोडकर, चुपचाप वो रुखसत हुए
राज सीने में दफन और बस खुदा हमराज था

जयश्री अंबासकर

ये शायरी आप मेरी आवाज में नीचे दी हुई लिंकपर सुन सकते है

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ख्वाब में उनका सताना जी हमें मंजूर है
निंद आंखोंसे गंवाना भी हमें मंजूर है

महफिले उनकी गजब होगी हमे मालूम है
सिर्फ उनका गुनगुनाना भी हमें मंजूर है

मुस्कुराके रोक लेना कातिलाना है बडा
इस तरह उनका मनाना जी हमें मंजूर है

बात अब हर एक उनकी मान लेते प्यार से
महज उनका हक जताना भी हमें मंजूर है

देर से आना पुरानी आदतों में एक है
झूठ उनका हर बहाना भी हमें मंजूर है

साथ उनका शायराना पल लगे हर खुशनुमा
वक्त का खामोश चलना भी हमे मंजूर है

जयश्री अंबासकर

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खुद से ही मिलने हूं आई, बडी मुद्दत के बाद
खुद ने हिम्मत है जुटाई, बडी मुद्दत के बाद

खुद से खुद को मिलने की, जरूरत थी आज
खुद को फुरसत है मिल पाई, बडी मुद्दत के बाद

जाने क्या नाराजगी थी खुदको,  खुद के साथ
हुई आज ही मूंहदिखाई, बडी मुद्दत के बाद

नजरे खुद से जब मिलाई खुद ने, शरारत से
नजरे खुद से है शरमाई, बडी मुद्दत के बाद

खुद को पाया है आज, बडी शिद्दत के बाद
ऐसी जन्नत है मिल पाई, बडी मुद्दत के बाद

खुद से मुलाकात हुई, बडी शराफत के साथ
खुद से खुद इज्जत है पाई, बडी मुद्दत के बाद

खुद ने रख्खा था खुद को, बडी हिफाजत के साथ
ये खुद ने समझी है खुदाई, बडी मुद्दत के बाद

बातों का कारवां चलता रहा, इबादत के साथ
बाते जज्बाती होती गई, बडी मुद्दत के बाद

खुद से मिलने से पहले, खुद की दहशत सी थी
खुद से ही मुहोब्बत हुई, बडी मुद्दत के बाद

जयश्री अंबासकर

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