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Archive for the ‘Youtube’ Category

साथ लाया था वो सेहरा और खिंचा दायरा
अब तो जीवन भर है पहरा और खिंचा दायरा

ख्वाब आंखो में हजारो, जिंदगी की आस है
ख्वाब टूटे, सब है बिखरा और खिंचा दायरा

दौडना तो दूर है, चलना भी मुश्किल है यहां
बेडियोंके के साथ कोहरा और खिंचा दायरा

बंद कमरा और आंसू, इतनी सीमित जिंदगी
अब तो है गुमनाम चेहरा और खिंचा दायरा

इस फलक पर नाम अपना देखने की चाह है
दिल है घायल, वक्त ठहरा और खिंचा दायरा

कितने दिन ऐसे जियेंगे, बस अभी सारे जुलम
है अटल संघर्ष गहरा और खिंचा दायरा

एक दिन आएगा ऐसा, कुछ करेंगे खुद ही हम
तोड देंगे हर वो पहरा और खिंचा दायरा

जयश्री अंबासकर

ही कविता तुम्हाला माझ्या आवाजात खाली दिलेल्या लिंकवर ऐकता येईल

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चुस्त लम्हें जिंदगीके खो गये जाने किधर
सुस्त सी खामोशियों में सिर्फ यादोंके भंवर

चंद बादल आसमां मे फिर भी था ऐसा असर
रोशनी सूरज की मेरे खो गयी जाने किधर

दूर तक कोई किनारा, अब भी ना आता नजर
डूबती कश्ती में कैसे, खत्म होगा ये सफर

सुबह की ना ताजगी है, रात को ना हमसफर
अब तो हिस्से में पडी है सिर्फ सूनी दोपहर

शोरगुल भी था कभी पर, अब तो जीवन  खंडहर
बस है सन्नाटों में लिपटे, सर्द से शामो सहर

जयश्री अंबासकर

You can listen this गझल on the link below

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मौजूद था पर आसमां में, चांद कुछ नाराज था
बेशक मेरे मेहबूब के ही, नूर का आगाज था      

क्या करू तारीफ उनकी, हर अदा थी शायरी
शायरीमें कातिलाना, क्या गजब अंदाज था

जन्नत से उतरी हूर सी थी, क्या  करू लफ़्जोबयां 
नर्गिसी मासूम चेहरा, हुस्न का सरताज था  

उनकी वो संजीदगी में, नर्म सा संगीत था
खिलखिलाना भी तो उनका, जैसे कोई साज था

शाम की तनहाइयों में दर्द का एहसास था
दर्द ना उनका कभी हमदर्द का मोहताज था

देखी है आंखों में उनकी, दर्द की परछाइयाँ  
जख्म क्या था, दर्द क्या था, ये छुपा इक राज था

चंद यादे छोडकर, चुपचाप वो रुखसत हुए
राज सीने में दफन और बस खुदा हमराज था

जयश्री अंबासकर

ये शायरी आप मेरी आवाज में नीचे दी हुई लिंकपर सुन सकते है

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तनहा ये राहे, मंजिल न कोई
लंबा सफर है  साहिल न कोई ॥

यादों में धुंदले, कुछ पल है तेरे
कुछ बिखरे बिखरे, कुछ है सवारे
न आहट है तेरी, न दस्तक है कोई
लंबा सफर है  साहिल न कोई ॥

ख्वाबों में हलचल, कभी थी बहारे
कटी उम्र सारी उसी के सहारे
लेकर उमंगे, आया न कोई
लंबा सफर है  साहिल न कोई ॥

परवाह ना थी, किसीको हमारी
आंखों में थी सिर्फ अश्कोंकी बारी
उम्मीद अब ना, हसरत न कोई
लंबा सफर है  साहिल न कोई ॥

गुमनाम गलियां, गुमनाम मेले
चलते रहे हम, अकेले अकेले
अब तो है आदत शिकायत न कोई
लंबा सफर है  साहिल न कोई ॥

जयश्री अंबासकर

You can listen this Poem in My Voice on the link below

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वृत्त – पृथ्वी
लगालललगा लगालललगा लगागालगा

कधी तिमिर दाटतो गडद होउनी अंतरी
उगाच हळव्या मना विकल होउनी पोखरी
हताश हरल्या मनास नसते उभारी मुळी
मना बिलगती निराश ढग साचते काजळी

जुन्याच जखमा करून उघड्या रडावे किती
उगाच खपल्या पुन्हा उकरुनी बघाव्या किती
तसेच कवटाळणे परत त्याच दु:खास का  
अशाच परिघातुनी सतत तू फिरावेच का

जरा उघड कोष तू विहर या नभी मोकळ्या
जरा उमलू दे, पुन्हा बहरु दे तुझ्याही कळ्या
असेल जपला कधी कवडसा पहा शोधुनी
दिसेल हसरी तुझीच प्रतिमा तुला दर्पणी

जयश्री अंबासकर

खाली दिलेल्या लिंकवर ही कविता माझ्या आवाजात ऐकता येईल

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