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Posts Tagged ‘जयश्री अंबासकर’

साथ लाया था वो सेहरा और खिंचा दायरा
अब तो जीवन भर है पहरा और खिंचा दायरा

ख्वाब आंखो में हजारो, जिंदगी की आस है
ख्वाब टूटे, सब है बिखरा और खिंचा दायरा

दौडना तो दूर है, चलना भी मुश्किल है यहां
बेडियोंके के साथ कोहरा और खिंचा दायरा

बंद कमरा और आंसू, इतनी सीमित जिंदगी
अब तो है गुमनाम चेहरा और खिंचा दायरा

इस फलक पर नाम अपना देखने की चाह है
दिल है घायल, वक्त ठहरा और खिंचा दायरा

कितने दिन ऐसे जियेंगे, बस अभी सारे जुलम
है अटल संघर्ष गहरा और खिंचा दायरा

एक दिन आएगा ऐसा, कुछ करेंगे खुद ही हम
तोड देंगे हर वो पहरा और खिंचा दायरा

जयश्री अंबासकर

ही कविता तुम्हाला माझ्या आवाजात खाली दिलेल्या लिंकवर ऐकता येईल

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जिंकण्याने सतत मी बेजार हल्ली
वाटते घ्यावी जरा माघार हल्ली

थांबले दिसते तुझे लढणेच आता
हारण्याचा थेट की स्वीकार हल्ली ?

संपली नाही लढाई जीवनाची
केवढे बोथट तुझे हत्यार हल्ली

शांतता आहे खरी की भास आहे
होत नाही कोणताही वार हल्ली

लागते रात्री सुखाची झोप आता
ना लढाई, ना चढाई फार हल्ली

मेळ झाला थांबला संहार हल्ली
जीवनाला देखणा आकार हल्ली

जयश्री अंबासकर

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चुस्त लम्हें जिंदगीके खो गये जाने किधर
सुस्त सी खामोशियों में सिर्फ यादोंके भंवर

चंद बादल आसमां मे फिर भी था ऐसा असर
रोशनी सूरज की मेरे खो गयी जाने किधर

दूर तक कोई किनारा, अब भी ना आता नजर
डूबती कश्ती में कैसे, खत्म होगा ये सफर

सुबह की ना ताजगी है, रात को ना हमसफर
अब तो हिस्से में पडी है सिर्फ सूनी दोपहर

शोरगुल भी था कभी पर, अब तो जीवन  खंडहर
बस है सन्नाटों में लिपटे, सर्द से शामो सहर

जयश्री अंबासकर

You can listen this गझल on the link below

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मौजूद था पर आसमां में, चांद कुछ नाराज था
बेशक मेरे मेहबूब के ही, नूर का आगाज था      

क्या करू तारीफ उनकी, हर अदा थी शायरी
शायरीमें कातिलाना, क्या गजब अंदाज था

जन्नत से उतरी हूर सी थी, क्या  करू लफ़्जोबयां 
नर्गिसी मासूम चेहरा, हुस्न का सरताज था  

उनकी वो संजीदगी में, नर्म सा संगीत था
खिलखिलाना भी तो उनका, जैसे कोई साज था

शाम की तनहाइयों में दर्द का एहसास था
दर्द ना उनका कभी हमदर्द का मोहताज था

देखी है आंखों में उनकी, दर्द की परछाइयाँ  
जख्म क्या था, दर्द क्या था, ये छुपा इक राज था

चंद यादे छोडकर, चुपचाप वो रुखसत हुए
राज सीने में दफन और बस खुदा हमराज था

जयश्री अंबासकर

ये शायरी आप मेरी आवाज में नीचे दी हुई लिंकपर सुन सकते है

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वृत्त – अनलज्वाला
मात्रा ८ ८ ८

वणवण फिरुनी, धावुनि दमतो संध्याकाळी
दिवस उसासे टाकत असतो संध्याकाळी

थकून वारा निपचित असतो संध्याकाळी
कधी विरक्ती घेउन फिरतो संध्याकाळी

दिवसभराची दिनकर करतो वेठबिगारी
दमून सुटका मागत असतो संध्याकाळी

निशेस येण्या अवधी असतो अजुन जरा अन्
दिवसच हातुन निसटत असतो संध्याकाळी

विचार भलता येतो कायम कातरवेळी
मनास विळखा घालुन बसतो संध्याकाळी

चुकाच केल्या आजवरी का वाटत असते
उगाच शिक्षा भोगत बसतो संध्याकाळी

भरकटलेले गलबत माझे सावरतो मी
नवा किनारा शोधत फिरतो संध्याकाळी

नव्या दमाने खेळत असतो रोज सकाळी
पुन्हा तसाच पराजित असतो संध्याकाळी

चराचराच्या नश्वरतेचा जागर होतो
तनमन सारे व्याकुळ करतो संध्याकाळी

प्रसन्न करतो देवघरातुन सांजदिवा मग
मनास उजळत तेवत असतो संध्याकाळी

जयश्री अंबासकर

खाली दिलेल्या लिंकवर तुम्हाला माझी गझल माझ्या आवाजात ऐकता येईल.

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